परिचय

Tuesday 23 October 2007

पुलिस,बच्चे ऒर लुच्चे-लफंगे

पहले-
पुलिस को देखकर
बच्चे घरों में दुबक जाते थे.
लुच्चे,लफंगे ऒर बदमाश
सामने आने से घबराते थे.
अब-
पुलिसवाला
बच्चों से घबराता हॆ,
लुच्चे,लफंगे,बदमाशों को देखकर
चुपचाप निकल जाता हॆ.
अरे !
मॆनें तो यहां तक सुना हॆ
कि आजकल-
हर बदमाश
पुलिसवाले को ’बडा भाई’
कहकर बुलाता हॆ.
पुलिसवाला भी-
बडे भाई का दायित्व
पूरी तरह से निभाता हॆ
य़ह बात अलग हॆ
कि कुछ कमीशन खाता हॆ.
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Sunday 7 October 2007

ना लायक हॆ.

हमने उनसे पूछा-
आपका बेटा-बेकूफ हॆ?
वो बोले-
’ना लायक’ हॆ.

आत्मनिर्भरता
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वो-
पहले-पडे थे
अब-
खडे हॆं
चलो-
आत्मनिर्भरता की ओर
कुछ तो बढे हॆं.
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Friday 5 October 2007

सूरज निकल रहा हॆ

सूरज निकल रहा हॆ
ऒर तुम
सो रहे हो.
स्वपनों की दुनिया में
कहां खो रहे हो.
स्वपन सिर्फ स्वपन होते हे.
सुनहरे स्वपन
रुपहले स्वपन
मीठे-मीठे
जहरीले स्वपन.
ओ भईया! कपडा बनाने वाले
ओ भईया! अनाज उपजाने वाले
अरे ओ बाबू! दफ्तर को जाने वाले
जरा आंखें खोलो तो
ये खिडकी,दरवाजे खोलो तो
देखो बाहर-
लाल-लाल सूरज
कॆसे निकल रहा हॆ?
पहाडियों के पीछे से
वह धीरे-धीरे
हमारी ओर बढ रहा हॆ.
झरनों की कल-कल
पंछियों का कलरव
कॆसे तत्पर हॆं-
उगते हुए सूर्य का
स्वागत करने को.
उठो! तुंम भी उठो!
ऎ मेरे कवि-मित्र!
सूर्य की रोशनी
देहली पर दस्तक दे रही हॆ
ओर तुंम-
अभी तक
सो रहे हो.
न जाने -
कल्पना की
किस दुनिया में
खो रहे हो.
तुमसे तो नहीं थी
ऎसी उम्मीद
आओ! मेरे साथ आओ
यथार्थ के घरातल पर आओ
नव-जागरण के गीत गाओ.
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