परिचय

Friday, 21 December, 2007

आज बहुत सर्दी हॆ

आज बहुत सर्दी हॆ
पक्षियों का चहचहाना,
फूलों का मुस्कराना,
ऒर-कोयल की कूक से,
मंत्र-मुग्ध हो जाना,
खत्म हो गया हॆ.
आज बहुत सर्दी हॆ

रामलाल-
सेठ के यहां,
मजदूरी कम मिलने पर,
नहीं चिल्लायेगा,
चुपचाप आ जायेगा.

आज बहुत सर्दी हॆ
शरीर का हर अंग
शून्य हो गया हॆ,
तभी तो-
किसी अंग के
काट दिये जाने पर भी
दर्द नहीं होता.

आज बहुत सर्दी हॆ
सब-कुछ बर्फ हो गया हॆ,
रक्त जम गया हॆ,
तभी तो-
किसी कली को कुचला देख,
हमारा खून नहीं खोलता.
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3 comments:

परमजीत बाली said...

अच्छी रचना है।बधाई।

Mired Mirage said...

कविता अच्छी लगी ।
घुघूती बासूती

जेपी नारायण said...

कविता अच्छी है, सर्दी तो हर साल रहती है।