परिचय

Friday, 29 June, 2007

मजबूत siढी

मजबूत सीढी

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मॆं भी

अपनी इन बंद मुट्ठियों में

भर सकता हूं

सफलता का सम्पूर्ण इतिहास।

बन सकता हूं

चमकता सितारा

या फिर-

आकाश।

कोई मजबूत सी सीढी

मिल जाये

काश!

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1 comment:

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

अच्छी कविता लिखी है। बिना सीढ़ी आजकल कुछ भी मुमकिन नहीं।