परिचय

Saturday, 29 December, 2007

सुनाओ अपना हाल जी,मुबारक नया साल जी.


सुनाओ अपना हाल जी,
मुबारक नया साल जी
तुम्हारी बढती तोंद क्यों?
हमारे पिचके गाल जी.

तुम तो खाऒ हलवा-पूरी
मजा न आये बिन अंगूरी
इच्छा हो जाये सारी पूरी
हमको रोटी-दाल जी
सुनाओ अपना हाल जी
मुबारक नया साल जी.

कॆसे मोटे हो गये लाला?
देश का क्यों निकला दिवाला?
जरुर दाल में कुछ हॆ काला
उठते बहुत सवाल जी
सुनाओ अपना हाल जी
मुबारक नया साल जी.

’गांधी-बाबा’ तुम भोले थे
’अहिंसा’पर क्यों बोले थे
वो सपने क्या सलॊने थे
यहां तो रोज होते हलाल जी
सुनाओ अपना हाल जी
मुबारक नया साल जी.

यह आजादी धोखा हॆ
कुर्सी का खेल अनोखा हॆ
खून किसी ने शोखा हॆ
’जोखें’ करे कमाल जी
सुनाओ अपना हाल जी
मुबारक नया साल जी.

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2 comments:

Mired Mirage said...

बढ़िया !
घुघूती बासूती

Madan Saxena said...

सुन्दर भाव अभिवयक्ति है आपकी इस रचना में