परिचय

Tuesday 17 April 2007

प्रश्न:दो

प्रश्न-दर-प्रश्न
प्रश्नों की
एक अंतहीन कतार
कई बार-
जी चाहता हॆ
फेंक दूं\ये कलम
ऒर उठा लूं-
मशाल.
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1 comment:

Mired Mirage said...

विनोद जी आपकी सभी कविताएँ बहुत अच्छी हैं । मुझे दुख है कि मैं आपके ब्लौग पर आज तक न आ सकी । कृपया अपने ब्लौग को नारद पर पंजीकृत करवाएँ वहाँ क्योंकि हम सभी के ब्लौग हैं अतः जाना सरल होता है । आशा है आप इस ओर ध्यान देंगे ।
http://narad.akshargram.com/
घुघूती बासूती